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80 वर्षीय बुजुर्ग के रोम-रोम में समाए राम! रामलीला में काम करते-करते लिख डाली हिन्दी पद्म शैली में संपूर्ण रामायण


हाइलाइट्स

सिवान के 80 वर्षीय डॉ रामचंद्र सिंह के कण कण में श्री राम समाए हुए हैं. वह पेश से प्रोफेसर रह चुके हैं.
बचपन से ही अपने पिता के मुख से राम की कथा सुनते-सुनते राम लीला में श्रीराम के चरित्र को पर्दे पर उतारा.

पटना. कहते हैं भक्ति में बड़ी शक्ति होती है. सिवान जिले के एक 80 वर्षीय बुजुर्ग ने यह चरितार्थ भी किया है. दरअसल सिवान के 80 वर्षीय डॉ रामचंद्र सिंह के कण कण में श्री राम समाए हुए हैं. वह पेशे से प्रोफेसर रह चुके हैं, लेकिन बावजूद इसके बचपन से ही अपने पिता के मुख से राम की कथा सुनते-सुनते राम लीला में श्रीराम के चरित्र को पर्दे पर उतारा और राम की भूमिका निभाने लगे. इस वजह से राम के प्रति लगाव बढ़ता चला गया और आख़िरकार उनकी राम के प्रति भक्ति ने उन्हें ऐसा प्रेरित किया कि संभवत हिंदी में पहली बार लिख डाली सम्पूर्ण रामायण, जो पद्म की शैली में लिखी गई है.

उन्होंने बताया कि उनके लिखे पुस्तक रामचन्द्रायण से संत समाज से लेकर सर संघ चालक मोहन भागवत भी काफ़ी प्रभावित हुए और बक्सर में संतों के समाग़म में पुस्तक का लोकार्पण किया. दरअसल, सिवान के रिटायर्ड प्रोफेसर 80 वर्षीय डॉ रामचंद्र सिंह ने हिंदी में संपूर्ण राम कथा की रचना रामचंद्रायण के नाम से की है. रामचंद्र सिंह बताते हैं कि आठ सौ पन्नों के इस महाकाव्य की रचना करने में 10 वर्ष की अथक साधना लगी है. सिवान जिले के सरसर गांव के निवासी प्रोफेसर रामचंद्र सिंह जो अपने नाम के साथ अपने गांव का नाम भी सरनेम की तरह इस्तेमाल करते हैं और इसी नाम से यानी कि रामचंद्र सिंह ‘सूरसरिया’ नाम से इस महाकाव्य की रचना की है.

20 वर्षों के तक रामलीला में किया अभिनय 

प्रोफेसर रामचंद्र सिंह ने बताया कि वह सिवान जिले के प्रतिष्ठित डीएवी कॉलेज में वर्षों तक रसायन शास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे हैं और साहित्य और अध्यात्म में इनकी गहरी रुचि रही है. वह अपने गांव सरसर में सैकड़ों वर्ष से चली आ रही परंपरागत रामलीला में भगवान राम की भूमिका भी निभाते रहे हैं. बाल्यकाल से लेकर युवावस्था तक करीब बीस वर्षों तक उन्होंने अपने गांव की रामलीला में श्रीराम का अभिनय किया. रामचंद्र सिंह ने कहा कि रसायनशास्त्र से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद सिवान के प्रतिष्ठित डीएवी कालेज में प्राध्यापक हुए. विज्ञान के विद्यार्थी होने के बावजूद उनका मन साहित्य रचना में लगा रहा. उन्होंने कई काव्यग्रंथों की रचना की लेकिन उनका मन श्रीराम कथा में ही रमता था.

10 वर्ष पहले आयी थी महाकाव्य के रचना की भावना 

रामचंद्र सिंह ने बताया कि करीब 10 वर्ष पूर्व हृदय में भाव आया कि आदि कवि वाल्मीकिजी की रामकथा का अवगाहन कर हिंदी में रामकथा का वर्णन करूं. करीब दस वर्षों की अनवरत साधना, संतों व रामकथा मर्मज्ञों के साथ सत्संग के बाद रामचन्द्रायण नामक महाकाव्य की रचना की. सात कांडों वाले इस महाकाव्य के प्रत्यक कांड सर्गों में विभक्त हैं. हिंदी में रचित इस ग्रंथ में कई स्थानों पर लोकगीतों की समृद्ध परंपरा के दर्शन होते हैं.

Tags: PATNA NEWS, Ramayan, Siwan news



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